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Sunday, April 3, 2022

ऑटिज्म से भयाक्रांत नही आरंभिक लक्षणों को चिन्हित करने की जरूरत:डॉ निमाई


परीक्षा के तनाव  को सहजता के मंत्र से जीतें:डॉ ऋतु

चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 92 वी ई संगोष्ठी 

शिवपुरी-जो भी बच्चा अपनी ही दुनियां में खोया हुआ है और सह जीवन की अन्य गतिविधियों में अभिरुचि प्रदर्शित नही करता है,वह ऑटिज्म का शिकार हो सकता है। ऑटिज्म से भयभीत होने की आवश्यकता नही है अपितु आरम्भिक 30 महीने में ऑटिज्म के लक्षणों को पकड़ने की कोशिश की जानी चाहिए।यह बात देश के ख्यात चिकित्सक डॉ जफर मीनाई ने चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 92 वी ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।बीइंग माइंडफुल  की संचालक डॉ ऋतु शर्मा पांडेय ने भी परीक्षा के तनाव पर महत्वपूर्ण टिप्स इस संगोष्ठी में दिए।

डॉ मीनाई के मुताबिक एक बच्चा अपने शिशुवय से विकास क्रम में जब अपनी ही दुनियां में खोया हुआ हो और अन्य  सामाजिक गतिविधियों  में उसकी अभिरुचियों के प्रति दिलचस्पी नही दिखाता हो तब अभिभावकों को सतर्कता के साथ काम करने की आवश्यकता होती है।हालाकि ऑटिज्म को 

 चिन्हित करने की कोई सरल प्रविधि नही है और एमआरआई से भी इसे सामान्यतःनही पकड़ा जा सकता है। इसलिए बच्चों की दैनंदिन क्रियाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।उन्होंने बताया कि अगर बच्चा मोबाइल में एक ही तरह के खेल या गाना सुनता है या एक ही तरह के खाना पसंद करता, एक ही खिलौने से खेलता है और  केवल एकतरफा बात करता है तो यह ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। बच्चों के सोशलाइजेशन एवं कम्युनिकेशन स्किल में असामान्य व्यवहार पर हमें तत्काल सतर्क होने की आवश्यकता है।उन्होंने बताया कि दुनियाभर में एक प्रतिशत बच्चों में ऑटिज्म की समस्या है लेकिन यह भी तथ्य है कि एक तिहाई बच्चे में ऑटिज्म के साथ मानसिकता विकलांगता नही होती है।

एक से दो साल के बच्चे  अगर 14 से 16 महीने में बोलना कर बंद कर दे।अपनी चीजों को किसी भी तरह से साझा न करें।ऊंची आवाज को लेकर डर जाते हो।और सिर्फ अपनी  ही रुचि के काम करते हो तो हमें तत्काल पेशेवर चिकित्सक की सलाह अवश्य लेना चाहिये। डॉ मीनाई ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऑटिज्म से भयाक्रांत नही होना चाहिए क्योंकि विश्व भर में करोड़ों लोग इसके जरिये दिव्यांगता का दावा करते है।इसलिए डरने की नही बच्चों की आरंभिक गतिविधियों को चिन्हित कर उसके निवारण का प्रयास किया जाना चाहिए।

आनन्द और मानसिक खुशी के लिए कार्य कर रहीं डॉ ऋतु शर्मा पांडेय ने अपने उद्बोधन में परीक्षाओं को लेकर बाल मन के तनाव पर बहुत ही प्रामाणिक टिप्स  दिए।उन्होंने बताया कि परीक्षा जीवन नही है बल्कि उसका क्षणिक पड़ाव भर है इसलिए अभिभावकों की यह समग्र जबाबदेही है कि वे अपने बच्चों को मानसिक रूप से इस तरह तैयार करें कि यह बोझ का वायस नही बन पाए।परीक्षा बच्चों के लिए  पीड़ितपक्ष का आधार नही बनाया जाना चाहिए।

डॉ शर्मा ने जोर देकर कहा कि तनाव को उतपन्न करने वाली स्थितियां मन की चंचलता से निर्मित होती है और हमें सदैव वर्तमान में खुली आँखों के साथ जीने का प्रयास करना चाहिये।बच्चों की मनःस्थिति को माँ पिता,मित्र,रिश्तेदार,स्कूल की अपेक्षाओं की चुनौती से मुकाबिल होना पड़ता है।जीवन मे वास्तविकता और दृष्टिकोण के बुनियादी अंतर को ईमानदारी से समझने की आवश्यकता होती है।

सहजता जीवन का मूल गुणधर्म है इसे हमें परिस्थितिजन्य अपने जीवन से ओझल कर देते है लेकिन जीवन का सर्वाधिक प्रकटीकरण सहजता के धरातल पर ही संभव है।सहजता का उन्नयन वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य है।इसलिए हमें महज किताबी परीक्षा और अंकों में बच्चों की वास्तविक प्रतिभा को कमतर करने की कोशिशें की है।डॉ पांडेय ने कहा कि तनाव जन्मजात या वंशानुगत नही है बल्कि अर्जित किया होता है।अभिभावकों को अपना संसार लोक अपने बच्चों पर कभी नही थोपना चाहिये।

चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने कहा कि परीक्षाओं की मौजूदा अवधारणा ने एक भयाभय वातावरण की निर्मिति कर दी है जिसका कोई वास्तविक महत्व नही है।आज परीक्षा का तनाव लोक विमर्श का बिषय बन गया है देश के प्रधानमंत्री को इस पर हर साल सार्वजनिक संवाद करना पड़ा है यह सामुदायिक रूप से एक खतरनाक संत्रास है।

ई संगोष्ठी में देश के 14 राज्यों से बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।आभार प्रदर्शन ग्वालियर के पूर्व अध्यक्ष डॉ केके दीक्षित ने व्यक्त किया।

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