वीरेन्द्र शर्मा
लोकतंत्र में सत्ता के लिए सियासी तौर पर जिस तरह की भामाशाही का प्रदर्शन सेवा कल्याण को लेकर प्रबल हुआ है उससे जीवन घसीटने पर बेबस मजबूर दिखाई देता है। हालात कई राज्यों में आर्थिक रूप से यह है कि सरकारों को चलाने और संस्थानों को जीवन देने धन का अभाव है मगर सियासी लोग है जो सेवा कल्याण के लिए अपनी भामाशाही के प्रदर्शन करने में कोई संकोच नहीं करते, अगर यों कहें कि मूलभूत सेवा कल्याण और विकास के ढांचे को दरकिनार कर वोट कबाड़ सत्ता हथियाने की जो संस्कृति प्रबल हुई है उसके चलते आज स्थापित संस्थाऐं और लोगों का सेवा कल्याण की आशा आकांक्षाओं का जीवन संकटमय हो गया है। वोटनीति के चलते सस्ती लोकप्रियता की खातिर जिस तरह की सेवा कल्याण के क्षेत्र में लोक लुभावन योजनाऐं बगैर परिणाम दिए आती जाती रहती है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर स्वयं एक सवाल है मगर बेबस मजबूर अभावग्रस्त लोगों का दुर्भाग्य यह है कि उसके पास अपनी बेबसी मजबूरी से मुक्ति पाने सिर्फ एक ही मार्ग है और वह है उसका अमूल्य वोट जो उसे हर हाल में लोकतंत्र को जिन्दा रखने डालना ही पड़ता है। अब ऐसे में वोट कबाड़ू भ्रम फैलाए या सेवा कल्याण की खातिर भामाशाह बन खुले मंचों से घोषणाऐं करें मगर आम गांव, गली, गरीब का भला होने वाला नहीं। आजाद भारत के विकास के 70 वर्ष गवाह है कि अगर सच्चा सेवा कल्याण हुआ होता तो आज सत्ताओं को लगभग आधी आबादी को आयुष्मान योजना और 80 करोड़ से अधिक लोगों को सस्ता राशन मुहैया ना कराना होता। ऐसा नहीं कि विकास नहीं हुआ जिस समतामूलक विकास की अपेक्षा संविधान निर्माताओं ने मानव धर्म की खातिर की थी आज वह उद्देश्य सफल होता दिखाई नहीं देता। यह अलग बात है कि कुछ राज्यों में चुनाव की घोषणा निर्वाचन आयोग कर चुका है तो कुछ राज्यों में चुनावों की घोषणा होना शेष है। अब ऐसे में आम गांव गली गरीब को क्या हासिल होगा, यह तो सत्ता की खातिर भामाशाह बन सियासी घोषणाऐं करने वाले सियासतदान ही जानें मगर जिस तरह की घोषणाऐं चुनाव से पूर्व सियासत करती आई है उसके परिणाम ना तो आज तक संपूर्ण सफल हुए और ना ही सार्थक हो सके।

No comments:
Post a Comment