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Saturday, February 3, 2024

शरीर में रहकर शरीर को छोडऩे का नाम साधना है : माता जी स्वास्ति भूषण


-माता जी ने बताया इससे मिलता है ज्ञान और ज्ञान है सुख का कारण

शिवपुरी। जैन धर्म में ब्रत्त, उपवास और पच्चकखाण इसलिए कराए जाते हैं ताकि शरीर में रहकर शरीर को छोड़ा जाए। शरीर के प्रति मूच्र्छा धीरे-धीरे कम की जाए। शरीर से दूर हटा जाए और आत्मा के नजदीक आया जाए। जैसे-जैसे आप आत्मा के नजदीक पहुंचते जाऐंगे वैसे-वैसे ज्ञान बढ़ता जाएगा और इसके साथ ही सुख भी बढ़ता जाएगा। ज्ञान ही सुख का कारण है। ज्ञान आने के पश्चात आपको विदित होगा कि सुख वाहरी बस्तुओं में नहीं है बल्कि सुख का सागर आपके भीतर है। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन आर्यिका स्वास्तिभूषण माता जी ने छत्री जैन मंदिर पर आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा के प्रारंभ में युवा गौरव जैन तथा कोलकत्ता से पधारी बहिनों ने भजन का गायन किया तथा दीप प्रज्वलन की रस्म जिला पंचायत के अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी महावीर जैन और पारस कोचेटा ने निर्वहन की। धर्मसभा का संचालन संजीव बांझल ने किया।

धर्र्मसभा में माता जी स्वास्ति भूषण ने अपने प्रेरक उदबोधन में बताया कि संसार का प्रत्येक प्राणी सुख का आकांक्षी है। सुख के लिए वह बाहर के संसार में दौड़ लगाता है। सोचता है कि धन दौलत, ऐश्वर्य, सत्ता एकत्रित कर वह सुख प्राप्त कर लेगा लेकिन उसे सुख नहीं मिलता। बल्कि दु:ख की मात्रा बढ़ती जाती है। उन्होंने कहा कि परिग्रह दु:ख का कारण है। परिग्रह है क्या? इसे भी माता जी ने स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि बस्तुओं के प्रति मोह होना परिग्रह है इसे मूच्र्छा परिग्रह भी कहते हैं। जब बस्तुओं के प्रति ममत्व और मोह भाव खत्म हो जाता है तो अपरिग्रह का जन्म होता है। दृष्टि भीतर की ओर मुड़ जाती है। सारा आनंद भीतर है। कस्तुरी कुण्डल बसे मृग ढंूड़े जग माही। माता जी ने कहा कि हर स्थिति में खुश और प्रसन्न होना आप सीखिए। जीवन में सकारात्मकता लार्ईए। सकारात्मक विचार से जीवन में आनंद और सुख की प्राप्ति होती है।

भिखारी और संत की स्थिति एक जैसी, लेकिन फर्क बहुत बड़ा
आर्यिका स्वास्तिभूषण माता जी ने बताया कि एक भिखारी जो सड़क पर है उसके पास पहनने को बस्त्र नहीं, खाने का ठिकाना नहीं, कोई धन संपत्ति नहीं, कोई परिवार नहीं है। ऐसी ही स्थिति साधू की होती है। लेकिन फिर भी भिखारी और संत में बहुत बड़ा फर्क होता है। भिखारी ममत्व भाव से मुक्त नहंी होता। संसार की बस्तुओं में न होते हुए भी उसका आकर्षण बना रहता है। उसका मन परिग्रही होता है, लेकिन संत ममत्व भाव से मुक्त होते हैं। बाहर की बस्तुओं में उन्हें कोई आकर्षण नहीं होता। वह संसार में रहते हुए भी संसार से दूर रहते हैं। कोई बस्तु छोड़ते नहीं है। लेकिन कोई बाहरी बस्तु उन्हें पकड़ती भी नहीं है। आर्यिका माँ ने समझाया कि हमें भी जीवन में उस स्थिति को प्राप्त करना है।

धर्म क्षेत्र में दंभ सेे मुक्त होकर जिज्ञासू बनें: आर्यिका माँ
आर्यिका स्वास्ति भूषण माता जी ने बताया कि धर्म क्षेत्र जिज्ञासुओं के लिए हैं। उन्होंने एक कहानी सुनाते हुए कहा कि एक संत एक नगर में पधारे और लोगों ने उनसे प्रवचन के लिए कहा तो उन्होंने पूछा की क्या आप लोग ज्ञानी है। इस पर जवाब आया कि इस नगर के सभी लोग ज्ञानी है। इस पर संत ने कहा कि जब आप ज्ञानी हैं तो मेरे प्रवचन की क्या आवश्यकता दूसरे दिन फिर लोगों ने प्रवचन का अनुरोध किया तो वही सवाल और जवाब  था कि हम अज्ञानी है इस पर संत ने कहा कि अज्ञानी मेरा क्या प्रवचन समझेंगे। तीसरे दिन फिर वहीं सवाल इस पर आधे लोगों ने कहा हम ज्ञानी और आधे ने कहा हम अज्ञानी। इस पर संत ने हंसते हुए कहा कि जो ज्ञानी है वह अज्ञानियों को ज्ञानवान बना दे। चौथे दिन संत ने फिर वहीं सवाल किया कि आप ज्ञानी है या अज्ञानी। इस पर लोगों ने कहा कि हमें नहीं पता आप ही बताऐं हम क्या है? इस पर संत ने कहा कि आप जिज्ञासु बनिए।

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