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Friday, June 19, 2026

उग्र तपस्वी और गोल्डन बुक अवार्ड से सम्मानित जैन संत राजेश मुनि का नगर में हुआ आगमन


भगवान महावीर के समान कठोर तपस्या और अभिग्रह पूर्ण होने पर ही लेते हैं आहार

शिवपुरी- प्रसिद्ध शेरे पंजाब, जिन शासन गौरव, संयम सुमेरू और संथारा स्पेशलिस्ट की उपाधि से सम्मानित प्रसिद्ध जैन संत राजेश मुनि का आज पदबिहार कर शिवपुरी आगमन हुआ जहां धर्मप्रेमियों ने उनका आत्मीय स्वागत किया। 50 वर्र्षीय जैन संत राजेश मुनि को दीक्षा ग्रहण किए हुए 26 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और वह 22 वर्षों से लगातार बेले-बेले (दो दिन का उपवास) की तपस्या कर रहे हैं और खास बात यह है कि दो दिन के उपवास के पश्चात पारणा (आहार) तब ग्रहण करते हैं जब मन में विचार हुआ उनका अभिग्रह पूर्ण हो जाता है। यदि अभिग्रह पूर्र्ण नहीं होता तो उनकी तपस्या आगे बढ़ जाती है।

 इस तरह से ढार्ई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर स्वामी ने जिस अभिग्रह साधना को अपने आध्यात्मिक जीवन का अंग बनाया। ठीक उसी तरह अभिग्रह कर संत राजेश मुनि महा अभिग्रहधारी की  उपाधि से न केवल सम्मानित हो चुके हैं बल्कि उन्हें उनकी असाधारण आध्यात्मिक उपलब्धियों और समाजसेवा के लिए गोल्डन बुक ऑफ रिकॉडर्स जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। उन्होंने अभी तक 2400 से भी अधिक अभिग्रह (कठोर व्रत) पूर्र्ण किए हैं। शिवपुरी में आज उनके उपवास का दूसरा दिन है और कल अभिग्रह पूर्ण हेतु वह कलेक्टर बंगले के पास स्थित राजेश कोचेटा के निवास स्थान पर सुबह 6 बजे पहुंचेंगे। देखना यह है कि यहां उनका अभिग्रह पूर्ण होता है अथवा नहीं। या फिर उन्हें अपनी तपस्या को आगे बढ़ाना होगा। शिवपुरी में उनके साथ उनके शिष्य संत राजेन्द्र मुनि भी पधारे। यहां उन्होंने पोषद भवन में एक विशाल धर्र्मसभा को संबोधित किया।

स्थानकवासी जैन समाज के श्रमण संघ से जुड़े संत राजेश मुनि का जन्म मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के इच्छापुर गांव में सन् 1973 में हुआ। बचपन से ही वह धार्र्मिक संस्कारों में पले और बढ़े तथा वर्ष 2001 में उन्होंने जैन दीक्षा ग्रहण की। उनके गुरू संत कानमुनि और संत उमेश मुनि रहे।  दीक्षा काल से उन्होंने भगवान महावीर की साधना और कठोर तपस्या को अंगीकार किया और बेले-बेले के उपवास करना प्रारंभ किए। उपवास के लिए वह पारणा हेतु जैन श्रावकों के निवास स्थान पर जाते हैं और मन में विचार कर लेते हैं यदि यह बातें उस घर में मिलेंगी तभी वह पारणा लेंगे। कर्ई बार उनका अभिग्रह पूर्ण नहीं हुआ और उन्हें अपनी तपस्या को आगे बढ़ाना पड़ा। घोर तपस्या के बावजूद वह पैदल उग्र विहार करते हैं। एक-एक दिन में उन्होंने 68 कि.मी. का पद बिहार कर एक रिकॉर्ड बनाया है।

संत राजेश मुनि ने साइस औैर कला में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर पीएचडी भी की है। वह अभी तक 132 लोगों को संथारे में पीएचडी करा चुके हैं। इंदौर में उनके उत्कृष्ट आध्यात्मिक योगदान और सामाजिक उपलब्धियों को देखते हुए एक चौराहे का नाम डॉ. राजेश मुनि मार्ग/अभिग्रह चौक रखा गया है। उनके विशाल व्यक्तित्व के विषय में जानकारी देते हुए संत राजेश मुनि और देवेन्द्र आंचलियां ने बताया कि गुरूदेव की सेवा कार्यों में विशेष रूचि है। वृद्ध साधु संतों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर उन्होंने बहुत कार्य किया है। सैकड़ों रोगियों को सहायता प्रदान की है तथा कोरोना काल में उनके प्रयासों से दो सौं से अधिक मरीजों का जीवन बच चुका है। संत राजेश मुनि ने बताया कि जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के अलावा वह जैन समाज को संगठित कर देश की सेवा करना उनका मुख्य लक्ष्य हैं। 

धर्र्मसाधना मन से भी न करो तो फलदायी होती है: संत राजेश मुनि

डॉ. राजेश मुनि ने पोषद भवन में आयोजित धर्र्मसभा में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य को 24 घंटे में से प्रत्येक घंटे में दो मिनिट धर्र्म के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। इस तरह से 24 घंटे में 48 मिनिट सामायिक (समता) की अवस्था में बैठना चाहिए। इससे वह दुनियादारी के पापों से बच सकेगा। यदि धर्म में रूचि भी न हो तो भी धर्र्म करना चाहिए ऐसा धर्र्म भी फलदायी होता है। संत राजेश मुनि ने कहा कि यदि हमने अपने आपको राग और द्वेष की भावना से मुक्त कर लिया तो मुक्ति असंभव नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें राग और द्वेष अपने से संबंधित लोगों के प्रति ही होता है। उनके प्रति हमारी भावना राग और द्वेष से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में हर स्थिति में सकारात्मक रहना चाहिए।

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