राधाष्टमी महोत्सव में छटवें दिन बताए संस्कार, कर्म और गृहस्थ धर्म के सूत्र, राम-सीता विवाह की झांकी ने मोहा मनशिवपुरी। श्रीराम जानकी तुलसी आश्रम बड़े हनुमान मंदिर परिसर में 10 से 19 सितंबर तक संगीतमय राधाष्टमी महोत्सव के रूप में मां जानकी कथा का आयोजन किया जा रहा है। महामंडलेश्वर श्री पुरुषोत्तम दास जी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित कथा में कथा यजमान श्रीमती अंजलि देवेंद्र शर्मा 'भैया-भैयाÓ परिवार हैं। कथा के छठवें दिन बालक देवाचार्य जी महाराज ने मां जानकी के चरित्र और रामकथा के प्रसंगों के माध्यम से परिवार, संस्कार, कर्म, भाग्य और गृहस्थ जीवन के धर्म पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कथा व्यास ने कहा कि मनुष्य को अपने संस्कारों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। परिवार में कभी किसी बात को लेकर विरोध की स्थिति बने तो घर के बड़े-बुजुर्गों के बार-बार कहने की आवश्यकता न पड़े, बल्कि उनके एक इशारे मात्र से शांत हो जाने की भावना संस्कारों का परिचय है। उन्होंने कहा कि परिवार में प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखना ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक पहचान है।
इस अवसर पर धर्मप्रेमीजन पं.अजय शंकर भार्गव, देवकीनंदन पाराशर, चंद्रपाल यादव, डॉ नितेंद्र रघुवंशी, समाजसेवी राजेंद्र गुप्ता सेठ, कपिल गुप्ता (कपिल मोटर्स), लालजी शिवहरे, अवधेश शिवहरे, डॉ. ओम प्रकाश नीखरा, वन कर्मचारी संघ के संभागीय अध्यक्ष दुर्गा ग्वाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु मौजूद रहे। कथा के दौरान लक्ष्मण जी के क्रोध के प्रसंग की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, विवेक और संस्कार मनुष्य को संयम रखना सिखाते हैं। उन्होंने गुरु विश्वामित्र के प्रसंग के माध्यम से गुरु की आज्ञा, अनुशासन और मार्गदर्शन के महत्व को भी समझाया।
भाग्य से अधिक कर्म पर जोर
बालक देवाचार्य जी महाराज ने भाग्य और कर्म की चर्चा करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों से भाग्य का निर्माण करना चाहिए। उन्होंने मेघों की बरसात का उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे वर्षा सब पर समान रूप से होती है, उसी प्रकार भगवान की कृपा भी सबके लिए समान है, लेकिन मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए संत सेवा, ब्राह्मण सेवा, दान और परोपकार करना मनुष्य का धर्म है। गृहस्थ आश्रम को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने गृहस्थ धर्म का ठीक से निर्वाह नहीं कर पा रहा, वह जीवन में आगे कैसे बड़ा बन पाएगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से जीवन में भारतीय संस्कृति और संस्कारों को बनाए रखने तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखने का आह्वान किया।
भाग्य से अधिक कर्म पर जोर
बालक देवाचार्य जी महाराज ने भाग्य और कर्म की चर्चा करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों से भाग्य का निर्माण करना चाहिए। उन्होंने मेघों की बरसात का उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे वर्षा सब पर समान रूप से होती है, उसी प्रकार भगवान की कृपा भी सबके लिए समान है, लेकिन मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए संत सेवा, ब्राह्मण सेवा, दान और परोपकार करना मनुष्य का धर्म है। गृहस्थ आश्रम को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने गृहस्थ धर्म का ठीक से निर्वाह नहीं कर पा रहा, वह जीवन में आगे कैसे बड़ा बन पाएगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से जीवन में भारतीय संस्कृति और संस्कारों को बनाए रखने तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखने का आह्वान किया।
राम-सीता विवाह की झांकी रही आकर्षण का केंद्र
कथा के अंतिम चरण में श्रीराम विवाह की कथा का संगीतमय वर्णन किया गया। इसके पश्चात भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह की मनोहारी झांकी प्रस्तुत की गई। राम-सीता की वरमाला का दृश्य श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विवाह प्रसंग के दौरान श्रद्धालु भक्ति और उत्साह में सराबोर नजर आए। विवाह संपन्न होने के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने राम-सीता के स्वरूप का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
कथा के अंतिम चरण में श्रीराम विवाह की कथा का संगीतमय वर्णन किया गया। इसके पश्चात भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह की मनोहारी झांकी प्रस्तुत की गई। राम-सीता की वरमाला का दृश्य श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विवाह प्रसंग के दौरान श्रद्धालु भक्ति और उत्साह में सराबोर नजर आए। विवाह संपन्न होने के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने राम-सीता के स्वरूप का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।




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