बच्चों के लिये जोखिमपूर्ण माहौल के लिये सामाजिक मानसिकता दोषी
शिवपुरी- जब बात बच्चों से यौन उत्पीडऩ के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीडऩ की घटनाएं आंखों के सामने उमडऩे लगती हैं लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की सर्वेक्षण रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में यौन शोषण का सामना करने वाले बच्चों में 52ण्94 फीसदी लड़के है। हैरानी की बात यह है कि अधिकांश लड़कों का यौन उत्पीडऩ नजदीकी लोगों के द्वारा किया गया है। यह बात बाल संरक्षण अधिकारी राघवेन्द्र शर्मा ने कही। वे रविवार को शहर के उत्कृष्ट विद्यालय में मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम के तहत संचालित बैचलर ऑफ सोशल वर्क पाठ्यक्रम के प्रशिक्षणार्थियों को बाल यौन शोषण निरोधक पॉक्सो कानून की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा सिर्फ लड़कियां ही नहीं बल्कि संपूर्ण बचपन ही असुरक्षित है पॉक्सो कानून बगैर लैंगिक भेदभाव के हर बच्चे की हिफाजत करता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में विभागीय सामाजिक कार्यकर्ता जीतेश जैन, मेंटर्स ओमवती भार्गव, उर्मिला निगम, अनुज कुमार दुवे एवं केशव शर्मा आदि मौजूद थे।
लड़का-लड़की दोनों के लिए समान है पॉक्सो एक्ट
पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस) एक जेंडर न्यूट्रल कानून है। जो लड़के और लड़की दोनों को समान रूप से यौन अपराधों से संरक्षित करता है। कानून में 12 साल से कम उम्र के बच्चे(लड़का हो या लड़की)के साथ दुष्कर्म में मौत की सजा का प्रावधान किया है। अभिभावकों को अपनी बेटियों के साथ ही बेटों को लेकर भी सचेत रहना होगा। बचाव के तरीके उन्हें दोनों को समान रूप से बताने होंगे। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पहले तो यौन शोषण के मामले कभी सामने ही नहीं आते और अगर सामने भी आजाएं तो लोक अपवाद के कारण उसे दबाने का प्रयास किया जाता है। लड़कों के साथ भी यौन शोषण हो सकता हैए आज भी समाज इस बात को स्वीकार नहीं करता। इसी दूषित सामाजिक मानसिकता के कारण हजारों मासूमों के जिस्म के साथ पशुवत मानसिकता वाले खेलते रहते है। इस स्थिति को सिर्फ कठोर कानूनों से रोका जाना संभव नहीं है। मानसिकता में बदलाव बहुत जरूरी है, अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार और कानून को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए। इसे रोकने के प्रयास हर स्तर पर जरूरी है।
शिवपुरी- जब बात बच्चों से यौन उत्पीडऩ के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीडऩ की घटनाएं आंखों के सामने उमडऩे लगती हैं लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की सर्वेक्षण रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में यौन शोषण का सामना करने वाले बच्चों में 52ण्94 फीसदी लड़के है। हैरानी की बात यह है कि अधिकांश लड़कों का यौन उत्पीडऩ नजदीकी लोगों के द्वारा किया गया है। यह बात बाल संरक्षण अधिकारी राघवेन्द्र शर्मा ने कही। वे रविवार को शहर के उत्कृष्ट विद्यालय में मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम के तहत संचालित बैचलर ऑफ सोशल वर्क पाठ्यक्रम के प्रशिक्षणार्थियों को बाल यौन शोषण निरोधक पॉक्सो कानून की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा सिर्फ लड़कियां ही नहीं बल्कि संपूर्ण बचपन ही असुरक्षित है पॉक्सो कानून बगैर लैंगिक भेदभाव के हर बच्चे की हिफाजत करता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में विभागीय सामाजिक कार्यकर्ता जीतेश जैन, मेंटर्स ओमवती भार्गव, उर्मिला निगम, अनुज कुमार दुवे एवं केशव शर्मा आदि मौजूद थे।
लड़का-लड़की दोनों के लिए समान है पॉक्सो एक्ट
पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस) एक जेंडर न्यूट्रल कानून है। जो लड़के और लड़की दोनों को समान रूप से यौन अपराधों से संरक्षित करता है। कानून में 12 साल से कम उम्र के बच्चे(लड़का हो या लड़की)के साथ दुष्कर्म में मौत की सजा का प्रावधान किया है। अभिभावकों को अपनी बेटियों के साथ ही बेटों को लेकर भी सचेत रहना होगा। बचाव के तरीके उन्हें दोनों को समान रूप से बताने होंगे। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पहले तो यौन शोषण के मामले कभी सामने ही नहीं आते और अगर सामने भी आजाएं तो लोक अपवाद के कारण उसे दबाने का प्रयास किया जाता है। लड़कों के साथ भी यौन शोषण हो सकता हैए आज भी समाज इस बात को स्वीकार नहीं करता। इसी दूषित सामाजिक मानसिकता के कारण हजारों मासूमों के जिस्म के साथ पशुवत मानसिकता वाले खेलते रहते है। इस स्थिति को सिर्फ कठोर कानूनों से रोका जाना संभव नहीं है। मानसिकता में बदलाव बहुत जरूरी है, अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार और कानून को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए। इसे रोकने के प्रयास हर स्तर पर जरूरी है।

No comments:
Post a Comment