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Thursday, August 13, 2026

सदियों में अवतरित होते हैं आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जैसे महान संत


पांच दिन तक चले धार्मिक कार्यक्रमों का गुणानुवाद सभा के साथ हुआ समापन

शिवपुरी- जैन धर्म के स्थानकवासी समाज के द्वितीय आचार्य आनंद ऋषि जी महाराज के 126 वें जन्म जयंती महोत्सव के अवसर पर पोषद भवन में पांच दिन तक चले धार्मिक कार्यक्रमों का गुणानुवाद सभा के साथ समापन हुआ। गुणानुवाद सभा में प्रसिद्ध जैन साध्वी प्रमोद कुंवर जी महाराज की सुशिष्या साध्वी चेतना श्री जी और साध्वी समिता श्री जी ने गुरुदेव के व्यक्तित्व के कई गुणों को रेखांकित किया और कहा कि हजारों वर्षों में आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी महाराज जैसे महान संत इस धरती पर जन्म लेते हैं और धर्म के सही रूप को स्पष्ट करते हैं। आचार्य श्री कहते थे कि धर्म सिर्फ क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं बल्कि आत्म रूपांतरण का एक माध्यम हैं। अंदर के कषायों और विकारों को दूर कर आत्मा की उन्नति धर्म का प्रमुख लक्ष्य हैं। 

जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक समाज के अध्यक्ष तेजमल सांखला ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने आचार्य श्री को आचार्य सम्राट की उपाधि से सम्मानित किया था और भारत सरकार ने उनकी स्मृति में 1902 में डाक टिकट जारी किया था। धर्म सभा में स्थानकवासी जैन समाज के अध्यक्ष राजेश कोचेटा, राजकुमार श्रीमाल और अशोक कोचेटा ने अपने संबोधन में बताया कि आचार्य श्री ने मात्र 13 साल की उम्र में सन्यास धारण किया था और 80 वर्ष के दीक्षा काल में उन्होंने समाज को संस्कारित करने के अलावा जोडऩे का भी कार्य किया। उस समय समाज में विघटन की स्थिति थी और आचार्य श्री ने 28 समुदायों को एकत्रित कर श्रमण संघ की स्थापना कर उन्हें एक झंडे के नीचे लाने का कठिन कार्य संपन्न किया। गुणानुवाद सभा के लाभार्थी ऋषभ कुमार, राजकुमार जैन श्रीमाल परिवार रहे वहीं प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी स्थानकवासी समाज के अध्यक्ष राजेश कोचेटा ने आचार्य श्री के जन्मदिन पर प्रसाद वितरण(परवाना) का लाभ लिया।

आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी महाराज का 126 वां जन्म जयंती समारोह शिवपुरी के पोषद भवन में उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। जिसमें स्थानकवासी जैन समाज और मूर्ति पूजक समाज ने साध्वी प्रमोद कुंवर जी महाराज, साध्वी चेतना जी और साध्वी समिता जी के प्रेरक नेतृत्व में बढ़ चढ़कर भाग लिया। समारोह में बेला (दो उपवास) और तेला (तीन उपवास) करने वाले भाई बहिनों का साध्वी समिता जी के परिजनों द्वारा बहुमान किया गया। पांच दिन तक चलने वाले समारोह के प्रथम दिन लोगस्स पाठ का आयोजन हुआ जिसमें सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सभी 24 तीर्थंकरों की वंदना की गई। प्रथम दिन के कार्यक्रम के लाभार्थी राजकुमार श्रीमाल परिवार रहे। दूसरे दिन धर्म सभा में उपस्थित सभी भाइयों बहनों ने तीन-तीन सामायिक का तेला किया और साध्वी समिता जी ने आचार्य श्री के सांसारिक जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बचपन से ही उन्हें धर्म में अगाध श्रद्धा थी और वह बच्चों के खेलों में कोई रुचि नहीं लेते थे। 

महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने आचार्य रत्न ऋषि श्रीजी से सन्यास ग्रहण किया। गुरू आज्ञा का वह सर्वोपरि मानते थे। दूसरे दिन के लाभार्थी धर्मचन्द्र कमलचंद्र कोचेटा परिवार रहे। तीसरे दिन वंदना दिवस का आयोजन हुआ जिसमें आचार्य पद के 36 गुणों का बखान करते हुए 36 बार आचार्य श्री को वंदन किया गया। वंदना दिवस के लाभार्थी पदमचंद, शैलेश और सुनीता कोचेटा परिवार रहे। चौथे दिन 40 श्रावक, श्राविकाओं ने आइ विल वृत्त किया। इस वृत्त में 24 घंटे में एक बार तपस्वी सिर्फ रूखा सूखा भोजन ग्रहण करते हैं। आई विल के लाभार्थी ब्राह्मी बहु मंडल परिवार ने इस भूमिका का सार्थक निर्वहन किया।

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