व्यासपीठ से बालक देवाचार्य जी महाराज ने कहा—सुख-दु:ख जीवन का जोड़ा, दोनों परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखेंशिवपुरी। श्रीराम जानकी तुलसी आश्रम, बड़े हनुमान मंदिर परिसर में परम श्रद्धेय श्री श्री 1008 श्री मौनी जी महाराज गुरुदेव की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित राधाष्टमी महोत्सव एवं मां जानकी कथा में श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण कथा का श्रवण किया। कथा का वाचन व्यासपीठ से भागवत कथा आचार्य एवं पातालपुरी पीठाधीश्वर जगतगुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज द्वारा किया जा रहा है। आयोजन महामंडलेश्वर श्री पुरुषोत्तम दास जी महाराज के पावन सानिध्य में संपन्न हो रहा है।
कथा में विशेष रूप से अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री महामंडलेश्वर हनुमान दास जी महाराज, महामंडलेश्वर खण्डोवा वाड़ी फैजपुर महाराष्ट्र से पवन कुमार दास जी महाराज, परशुराम दास जी महाराज मडऱीधाम बासौदा, रामकृष्ण बालक दास जी महाराज बंगला चौराहा आदि संत महात्माओं के दर्शन एवं आशीर्वाद श्रद्धालुओं ने प्राप्त किया। कथा के मुख्य यजमान श्रीमती अंजलि-देवेंद्र शर्मा (लल्लू) भैया-भैया परिवार के संत कुमार शर्मा, मुकेश शर्मा, अनिल शर्मा अन्नी, देवांश शर्मा सहित परिजन कथा श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
कथा के दौरान जगतगुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज ने माता जानकी के ससुराल से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि बेटी का अपने पिता के साथ विशेष भावनात्मक लगाव होता है। उन्होंने माता-पिता और बेटियों के रिश्ते की संवेदनशीलता को समझाते हुए कहा कि पिता अपनी बेटी के प्रति हमेशा चिंतित रहता है और राजा जनक भी माता जानकी के प्रसंग में भावुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सुख और दु:ख जीवन के दो पहलू हैं। जीवन में सुख आए तो प्रसन्न रहना चाहिए और दु:ख आने पर घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि कोई भी परिस्थिति स्थायी नहीं होती। समय के साथ दु:ख भी समाप्त हो जाता है। यह प्रकृति और विधाता का नियम है।
कथा के दौरान जगतगुरु श्री बालक देवाचार्य जी महाराज ने माता जानकी के ससुराल से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि बेटी का अपने पिता के साथ विशेष भावनात्मक लगाव होता है। उन्होंने माता-पिता और बेटियों के रिश्ते की संवेदनशीलता को समझाते हुए कहा कि पिता अपनी बेटी के प्रति हमेशा चिंतित रहता है और राजा जनक भी माता जानकी के प्रसंग में भावुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सुख और दु:ख जीवन के दो पहलू हैं। जीवन में सुख आए तो प्रसन्न रहना चाहिए और दु:ख आने पर घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि कोई भी परिस्थिति स्थायी नहीं होती। समय के साथ दु:ख भी समाप्त हो जाता है। यह प्रकृति और विधाता का नियम है।
बालक देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि बेटी को हमेशा मायके में रखना संभव नहीं होता। समाज की अपनी परंपराएं और व्यवस्थाएं हैं, इसलिए बेटी का मायके और ससुराल दोनों स्थानों से जुड़ाव बना रहना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बेटी और लक्ष्मी को एक समान माना गया है—दोनों का जीवन में आना-जाना बना रहे तो संतुलन बना रहता है। उन्होंने कहा कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर रिश्तों की भूमिकाएं भी बदलती हैं। बेटी के रूप में पिता से, पत्नी के रूप में पति से और मां के रूप में संतान से उसका गहरा जुड़ाव रहता है। यही जीवन की स्वाभाविक व्यवस्था है, जिसे समझकर मनुष्य को हर परिस्थिति को सहजता से स्वीकार करना चाहिए। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर मां जानकी के चरित्र एवं उनके जीवन प्रसंगों का श्रवण किया।


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